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देवबंद के बड़े मौलवी का आशिक़े आला हज़रत ने किया ऑपरेशन । हवाला ग़लत साबित करने वाले को मिलेगा 11,786

सवाल नंबर 1:- क्या “उल्मा-ए-देवबंद” के नज़दीक ख़ुदा के सिवा कोई और भी “मुरब्बी-ए-ख़लाइक़” है? अगर उनके अक़ीदा में सिवाए ख़ुदा के कोई दूसरा भी “मुरब्बी-ए-ख़लाइक़” है, तो वह कौन है ? जवाब:- हाँ “उल्मा-ए-देवबंद” के नज़दीक मौलवी रशीद अहमद गंगोही “मुरब्बी-ए-ख़लाइक़” हैं। जैसा कि मौलवी महमूद हसन, सदर मुदर्रिस मदरसा देवबंद फ़रमाते हैं। हवाला: मर्सिया रशीद अहमद, मुसन्निफ़ा मौलवी महमूद हसन, सफ़्हा 12 पर है।

ख़ुदा उनका मुरब्बी, वह मुरब्बी थे ख़लाइक़ के ! मेरे मौला, मेरे हादी थे, बेशक शैख़े रब्बानी !!

तंबीह:- इस शेअर में मौलवी महमूद हसन ने मौलवी रशीद अहमद को “मुरब्बी-ए-ख़लाइक़” लिखा है, जो “रब्बुल्आलमीन” के हम मानी है। शायद “ज़रुरते शेअरी” की वजह से ” रब्बुल्आलमीन” नहीं लाए। यह है “पेशवा-ए-देवबंद” की अक़ीदतमंदी। कितने खुले लफ़्ज़ों में अपने पीर को सारी मख़्लूक़ का पालने वाला कह रहे हैं। वाक़ई पीरपरस्ती इसी का नाम है।

सवाल नंबर 2:- वह “मसीहा” कौन है, जिस ने “मुर्दे” भी जिलाए और “ज़िन्दों” को भी “मरने” से बचा लिया ? क्या “उल्मा-ए-देवबंद” में कोई ऐसा “मसीहा” हुआ है ? जवाब:। हाँ वह “मसीहा” अहले देवबंद के नज़दीक मौलवी रशीद अहमद गंगोही है। चुनांचे मौलवी देवबंदी की शान में इर्शाद फ़रमाते हैं और पुकार कर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को अपने पीर की “मसीहाई” दिखाते हैं। हवाला:- मर्सिया रशीद अहमद, मुसन्निफ़ा महमूद हसन, सफ़्हा 33

मुर्दों को ज़िंदा किया, ज़िन्दों को मरने ना दिया ! इस “मसीहाई” को देखें, ज़रा इब्ने मरियम !!

तंबीह:- वाक़ई देवबंदियों के नज़दीक मौलवी रशीद अहमद की “मसीहाई” हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से बहुत बढ़ गई, क्योंकि जो काम ईसा अलैहिस्सलाम भी ना कर सके, वह मौलवी रशीद अहमद ने करके दिखा दिया। मुर्दे जिलाने में तो बराबर ही थे, मगर ज़िन्दों को मौत से बचा लिया, इस में ज़रुर ईसा अलैहिस्सलाम से बढ़ गए, जब ही तो ईसा अलैहिस्सलाम को उनकी “मसीहाई” दिखाई जाती है। अगर मौलवी रशीद अहमद की “मसीहाई” हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से बढ़ी हुई ना जानते, तो यह ना कहते कि इस “मसीहाई” को देखें ज़रा इब्ने मरियम। मुसलमानों! इंसाफ़ करो। क्या इस में ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की तौहीन नहीं है, एक नबी का अपमान नहीं है? यक़ीनन इसमें ह़ज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की तौहीन है, एक नबी का अपमान है और ऐसा देवबंदी ही कर सकते हैं अहले ईमान नहीं।

सवाल नंबर 3:- क्या किसी इंसान के काले-काले बंदे भी “यूसुफ़े सानी” हैं? “उल्मा-ए-देवबंद” के मोतबर अक़्वाल से जवाब दीजिए। जवाब:- मौलवी रशीद अहमद साहब के काले-काले बंदे “यूसुफ़े सानी” हैं। चुनांचे, उनके ख़लीफ़ा मौलवी महमूद हसन देवबंदी फ़रमाते हैं। हवाला: मर्सिया रशीद अहमद साहब, सफ़्हा 11

क़बूलीयत इसे कहते हैं, मक़बूल ऐसे होते हैं ! उबैदे अस्वद का उनके लक़ब है “यूसुफ़े सानी” !!

तंबीह:- क्या ख़ूब कहा ? ख़ुदा-ए-तआला के आला दर्जा के हसीन व जमील बंदा यूसुफ़ अलैहिस्सलाम हैं, मगर मौलवी रशीद अहमद के काले-काले ही बंदे “यूसुफ़े सानी” बना दीये। गोरे-गोरे बंदों का क्या ठिकाना ? वाक़ई मक़बूलियत इसी का नाम है। मुसलमानों! ग़ौर करोगे तो मालूम हो जाएगा, इस एक ही शेअर में ख़ुदा और उसके नबी दोनों पर हाथ साफ़ कर दिया।

सवाल नंबर 4:- क्या आरिफ़ लोग “काअबा शरीफ़” में पहुंच कर किसी दूसरी जगह को तलाश किया करते हैं ? वह कौन सी जगह है ? क्या “उल्मा-ए-देवबंद” ने कोई ऐसी जगह बताई है ? जवाब:। हाँ आरिफ़ लोग “काअबा मुअज़्ज़मा” जाकर “गंगोह” तलाश किया करते हैं। जैसाकि मौलवी महमूद हसन देवबंदी फ़रमाते हैं। हवाला: मर्सिया रशीद अहमद, सफ़्हा 13

फिरे थे “काअबा” में भी, पूछते “गंगोह” का रास्ता ! जो रखते अपने सीनों में थे, ज़ौक़ व शौक़े इर्फ़ानी !!

तंबीह:- “काअबा मुअज़्ज़मा” जो “बैतुलल्लाह” ख़ाना-ए-ख़ुदा है, इस में पहुंच कर भी “गंगोह” की ही धुन लगी हुई है। इसे देवबंदी “इर्फ़ान” का नशा और गंगोही मार्फ़त का ख़ुमार ना कहा जाए तो और क्या कहा जाए ?

सवाल नंबर 5:- दोनों जहाँ की हाजतें किस से मांगें ? रुहानी व जिस्मानी हाजतों का क़िब्ला कौन है ? देवबंदी मज़हब पर जवाब दिया जाए। जवाब:- रुहानी और जिस्मानी सब हाजतों का क़िब्ला देवबंदी मौलवी के नज़दीक मौलवी रशीद अहमद साहब गंगोही हैं। सारी हाजतें उन्हीं से तलब करना चाहिए। उनके सिवा कोई “हाजत र-वा” नहीं। जैसाकि मौलवी महमूद हसन साहब देवबंदी फ़रमाते हैं। देखो, हवाला:- मर्सिया रशीद अहमद, सफ़्हा 10

हवाइज दीन व दुनिया के कहाँ ले जाएं हम या रब? गया वह क़िब्ल-ए-हाजाते रुहानी व जिस्मानी !!

फ़ायदा:- मौलवी रशीद अहमद साहब ने “ग़ैरुल्लाह” से मदद मांगने को “शिर्क” बताया है। “फतावा रशीदया”, हिस्सा सोम, सफ़्हा 6 पर है। सो, “ग़ैरुल्लाह” से मदद माँगना, अगरचे वली हो या नबी “शिर्क” है और मौलवी महमूद हसन साहब दोनों जहां की हाजतें उन्हीं से मांग रहे हैं। क़िब्ल-ए-हाजात उन्हीं को कह रहे हैं। लिहाज़ा “फतावा रशीदया” के हुक्म से मौलवी महमूद हसन साहब “मुशरिक” हुए और अगर मौलवी महमूद हसन साहब को “मूवह्दि” कहा जाए, तो मौलवी रशीद अहमद साहब को ज़रुर “ख़ुदा” कहना पड़ेगा। बोलो क्या कहते हो ?

सवाल नंबर 6:- सारे जहाँ का “मख़दूम” कौन है और सारा आलम किस की इताअत करता है ? “उल्मा-ए-देवबंद” के मज़हब पर जवाब दिया जाए। जवाब:- सारे आलम के “मख़दूम” देवबंदियों के नज़दीक मौलवी रशीद अहमद साहब गंगोही हैं और सारा आलम उन्हीं की इताअत करता है। हवाला मुलाहिज़ा हो। हवाला:- मर्सिया रशीद अहमद, मुसन्निफ़ा मौलवी महमूद हसन साहब के पहले ही सफ़्हा पर है।

“मख़दूमुल्कुल, मताउल आलम जनाब मौलाना रशीद अहमद साहब गंगोही”

सवाल नंबर 7:- वह कौन हाकिम है, जिसका कोई भी हुक्म “उलमा-ए-देवबंद” के नज़दीक टल नहीं सकता और उस का हर हुक्म “क़ज़ा-ए-मुबर्रम” है ? जवाब:- ऐसे हाकिम तो सिर्फ़ मौलवी रशीद अहमद साहब ही हैं। उनका कोई हुक्म भी नहीं टला। इसलिए कि उनका हर हुक्म “क़ज़ा-ए-मुबर्रम” की तलवार है । हवाला:- मर्सिया रशीद अहमद, सफ़्हा 31

नहीं रुका, पर नहीं रुका, पर नहीं रुका, पर नहीं रुका ! इसका जो हुक्म था, था “सैफ़े क़ज़ा-ए-मुबरम” !!

फ़ायदा:- वाक़ई कोई हुक्म नहीं टला और टलता कैसे ? “मुरब्बी ख़लाइक़” थे। कोई मज़ाक़ थे और अक़ीदतमंद लोगों ने किसी हुक्म को टलने भी ना दिया। इस से ज़्यादा अक़ीदतमंदी और क्या होगी कि जब मौलवी रशीद अहमद साहब ने “कव्वे” खाने का हुक्म दिया, तो “उलमा-ए-देवबंद” ने यह समझ कर कि “मुरब्बी ख़लाइक़” का हुक्म है, आँख बंद करके तस्लीम कर लिया और “कव्वे” खाने लगे।

सवाल नंबर 8:- वह कौन है, जिस की गु़लामी का दाग़ देवबंदी मज़हब में मुसलमानी का तमग़ा है ? जवाब:- वह मौलवी रशीद अहमद साहब गंगोही हैं। उन्हीं की गु़लामी मुसलमानी का तमग़ा है। चुनांचे, मौलवी महमूद हसन साहब फ़रमाते हैं। हवाला:- मर्सिया रशीद अहमद, सफ़्हा 6

ज़माना ने दिया इस्लाम को दाग़ उस की फुर्क़त का ! कि था दाग़े गु़लामी जिस का तमन्ना-ए- मुसलमानी !!

तंबीह:- मौलवी रशीद अहमद साहब की गु़लामी का दाग़ जब मुसलमानी का तमग़ा हुआ, तो जो उन का ग़ुलाम बना, उसी को यह “तमग़ा” मिला और जिस ने उन की गु़लामी ना की, इस “तमग़ा” से महरूम रहा। लिहाज़ा, देवबंदी या तो तमाम सहाबा व ताबईन व अइम्मा मुज्तहेदीन व औलिया-ए-कामेलीन को मौलवी रशीद अहमद साहब का ग़ुलाम मानते होंगे या उन तमाम मक़बूलाने ख़ुदा को मुसलमानी के “तमग़े” से ख़ाली जानते हैं।

सवाल नंबर 9:- क्या कोई ऐसा शख़्स भी हुआ है, जो अकेला ही सिद्दीक़ और फ़ारूक़ दोनों हो ? जवाब:- हाँ मौलवी रशीद अहमद साहब गंगोही सिद्दीक़ और फ़ारूक़ दोनों थे। चुनांचे मौलवी महमूद हसन साहब उनकी शान में तहरीर फ़रमाते हैं। हवाला:- मर्सिया रशीद अहमद, सफ़्हा 16

वह थे सिद्दीक़ और फ़ारूक़, फिर कहिए अजब क्या है ? शहादत ने तहज्जुद में क़दमबोसी की, गर ठानी !!

फ़ाइदा:- इन 9 सवालों के जवाबात मौलवी महमूद हसन साहब, सदर मुदर्रिस, मदरसा देवबंद की किताब, “मर्सिया रशीद अहमद” के हवाला से लिखे हैं। इनमें से एक हवाला भी ग़लत साबित कर देने पर 11,786 रुपया का इनाम दिया जाएगा

मुसलमानों! ज़रा तास्सुब और हट धर्मी को छोड़कर ग़ौर से पढो और नज़रे इंसाफ़ से देखो, तो हक़ व बातिल आफ़ताब से ज़्यादा रौशन हो जाएगा। मालूम हो जाएगा कि “मुशरिक और बिद्दती” कौन है? देखो “उलमा-ए-देवबंद” अपने पीरों से कैसी अक़ीदत रखते हैं। अपने पीरों को “मुरब्बी-ए-ख़लाइक़” मानते हैं। “बानी-ए-इस्लाम का सानी” जानते हैं, यानी दूसरा ख़ुदा। “मसीहाई में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम से बढ़ाते हैं”। काअबा में पहुंच कर भी पीर ही का “दरे गंगोह” तलाश करते हैं। “बिला तख़सीस सारे जहाँ को उनका ख़ादिम और मुतीअ जानते हैं”। “उनकी हुकूमत मिसले ख़ुदा मानते हैं”। “अपने पीर की गु़लामी को मुसलमानी का तमग़ा बताते हैं”।

मुसलमानों! लिल्लाह, इंसाफ़ करो और सच सच बताओ और बिला रियायत कहो कि जो लोग अपने पीरों से ऐसा अक़ीदा रखते हैं, वह हक़परसत या पीरपरस्त, मूवह्दि हैं या मुशरिक? इसका जवाब आपको ही देना है। मेरा काम आप तक सही बात हवाले के साथ पहुंचाना था सो मैंने पहुंचा दिया। मिलते हैं फिर किसी और टॉपिक के साथ। जब तक के लिए अल्लाह हाफिज़

About चीफ एडिटर सैफुल्लाह खां अस्दक़ी

I'm Mohammad Saifullah । I'm Founder And National President Of Ghause Azam Foundation (NGO) । I'm Chief Editor Of GAF News Network And Islamic Teacher

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