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गुस्ताख़े नबी की एक ही सज़ा, सर तन से जुदा

सरकार से मांग की जाए कि आपत्तिजनक टिप्पणियां करने वाले/ अभद्र व भड़काऊ भाषाओं का प्रयोग करने वाले और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले और नफ़रतों के सौदागरों के सरों को तन से जुदा किया जाए क्योंकि इतिहास गवाह है कि शासकों ने देश व समाज में शांति बनाए रखने के लिए वध को वैध माना था अवैध नहीं: मौलाना मोहम्मद सैफुल्लाह ख़ां अस्दक़ी

जब से यह नारा “गुस्ताख़े नबी की एक ही सज़ा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा” सड़कों पर लगने लगा है तभी से मैं सोच रहा था कि इस नारे पर कुछ लिखूं लेकिन ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के नेकी के कामों (नामूसे इस्लाम/ नामूसे मुल्क पर पहरा देने/ देश में प्यार की गंगा बहाने और ख़ुदा की मख़्लूक़ की ख़िदमत करने) को बराबर करते रहने के कारण समय ही नहीं मिल रहा है। इसलिए कुछ लिख न सका। अल्बत्ता आज रात जब मैंने आज तक न्यूज़ चैनल के लाइव प्रसारण में, संघी मानसिकता वाली गोदी मीडिया की तेज़ तर्रार एंकर, अंजना ओम कश्यप को बार बार इसी नारे पर गुस्सा करते हुए और आग बबूला होते देखा और हैदराबाद के गुस्ताख़े रसूल, भाजपा नेता, टी राजा सिंह के पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर अपमान जनक बयान पर गुस्सा करते हुए और आग बबूला होते नहीं देखा तो सोचा आज इस पर कुछ लिख ही देता हूं ताकि न रहे बांस और न बजे बांसुरी।

पहली बात: देश की किसी भी पार्टी के प्रवक्ता/ नेता आदि को अल्लाह/ इस्लाम/ पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अ़लैहे वसल्लम/ अज़ान/ नमाज़/ रोज़ा/ क़ुरआन/ शरीअ़त आदि पर आपत्तिजनक टिप्पणियां/ अभद्र व भड़काऊ भाषाओं का प्रयोग और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले बयानात को हर हाल में सरकार व पुलिस प्रशासन को रोकना ही होगा। कोई न माने तो उसे तुरंत गिरफ्तार करना होगा चाहे वह किसी पार्टी का प्रवक्ता हो या नेता या कोई और।

दुसरी बात: अगर सरकार व पुलिस प्रशासन तत्परता से आपत्तिजनक टिप्पणियां करने वाले/ अभद्र व भड़काऊ भाषाओं का प्रयोग करने वाले और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले और नफ़रतों के सौदागरों को गिरफ्तार नहीं करे तो संविधान के दायरे में रहकर जमकर प्रोटेस्ट किया जाए और सरकार से मांग की जाए कि आपत्तिजनक टिप्पणियां करने वाले/ अभद्र व भड़काऊ भाषाओं का प्रयोग करने वाले और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले और नफ़रतों के सौदागरों के सरों को तन से जुदा किया जाए क्योंकि इतिहास गवाह है कि शासकों ने देश व समाज में शांति बनाए रखने के लिए वध को वैध माना था अवैध नहीं। जैसे किसी और मामले में देशवासी फांसी की सज़ा की मांग सरकार से करते हैं, ठीक वैसे ही सरकार से “गुस्ताख़े नबी की एक ही सज़ा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा” की मांग करनी चाहिए और इस पर सरकार तत्काल अमल करके देश व समाज में शांति बनाए।

तीसरी बात: कुछ लोग यह समझते हैं कि इस नारे से हिंसा (Violence) को बढ़ावा मिलेगा। सरासर ग़तल और बेबुनियाद बात है। जबकि सही बात तो यह है कि इस नारे से मुराद यह है कि सरकार आपत्तिजनक टिप्पणियां करने वाले/ अभद्र व भड़काऊ भाषाओं का प्रयोग करने वाले और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले और नफ़रतों के सौदागरों के सरों को तन से जुदा करे। ऐसा नारा लगाने वाले सर तन से जुदा नहीं कर सकते हैं क्योंकि जनता को ऐसा काम करने की न तो संविधान इजाज़त देता है और न ही इस्लामी शरीअत। यह काम जनता का है ही नहीं बल्कि यह काम सरकार का है और सरकार को धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले लोगों पर ऐसा क़ानून बनाना ही चाहिए। आज कल राजनीति फायदे के लिए नफ़रतों के सौदागरों की ओर से अल्लाह/ इस्लाम/ पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अ़लैहे वसल्लम/ अज़ान/ नमाज़/ रोज़ा/ क़ुरआन/ हिजाब/ शरीअ़त आदि पर आपत्तिजनक टिप्पणियां/ अभद्र व भड़काऊ भाषाओं का प्रयोग और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले बयानात जारी करना आम बात सी हो गई है, जिसे देश का कोई भी व्यक्ति बर्दाश्त नहीं कर सकता है। इसे रोकना हर हाल में ज़रूरी है।

चौथी बात: अगर इस नारे से हिंसा (Violence) को बढ़ावा मिल सकता है तो फिर बलात्कारियों को फांसी दो, ज़ालिमों को फांसी दो जैसे अनेकों नारों से भी हिंसा (Violence) को बढ़ावा मिल सकता है। इसलिए ऐसे नारों को भी रोकना चाहिए। हालांकि सभी जानते हैं कि इन नारों से सरकार से मांग की जाती है कि सरकार बलात्कारियों को फांसी दे, ज़ालिमों को फांसी दे। ठीक उसी तरह अल्लाह/ इस्लाम/ पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अ़लैहे वसल्लम/ अज़ान/ नमाज़/ रोज़ा/ क़ुरआन/ शरीअ़त आदि पर आपत्तिजनक टिप्पणियां/ अभद्र व भड़काऊ भाषाओं का प्रयोग और धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले बयानात जारी करने वाले नफ़रतों के सौदागरों के लिए भी अगर यह नारा “गुस्ताख़े नबी की एक ही सज़ा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा” लगाया जाता है तो उससे मुराद यह है कि सरकार गुस्ताख़े नबी को सज़ा के तौर पर उसका सर तन से जुदा करे। ऐसी मांग करना कोई ग़लत नहीं है। अगर यह नारा ग़तल है तो बाक़ी और नारों को भी ग़लत मानना चाहिए।

पांचवी बातः आम लोगों का काम क़ानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखना है। शांति व्यवस्था बनाए रखना सरकार व पुलिस प्रशासन का है। जब सरकार व पुलिस प्रशासन शांति व्यवस्था बनाए रखने में असफल रहे तो समझ जाना चाहिए कि वाइलंस होने वाला है। ऐसी स्थिति में हर देशवासी को अपनी सुझ बुझ से काम लेना है ताकि नफ़रतों के सौदागरों की ओर से कोई राजनीति फायदा न उठा सके, हिन्दू मुस्लिम में दंगा न हो सके, आपसी भाईचारा बना रहे और देश में अमन चैन का माहौल बना रहे।

मौलाना मोहम्मद सैफुल्लाह ख़ां अस्दक़ी

राष्ट्रीय अध्यक्ष: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन

इस पोस्ट को पढ़ें और अपना मश्विरा दें। धन्यवाद Anjana Om Kashyap

About चीफ एडिटर सैफुल्लाह खां अस्दक़ी

I'm Mohammad Saifullah । I'm Founder And National President Of Ghause Azam Foundation (NGO) । I'm Chief Editor Of GAF News Network And Islamic Teacher

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