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हाजिओ आओ शहंशाह का रोज़ा देखो!

आशिक़ाने रसूल के लिए एक आशिक़े रसूल का कलाम तशरीह के साथ पेश किया जाता है, पढ़ें, झुमें और शेयर करें

बिरादराने मिल्लत! इस नात शरीफ़ में आला ह़ज़रत रहमतुल्लाह अलैहि ने बहुत ख़ूबसूरत और दिलनशीं अंदाज़ में उन लोगों के उस बातिल नज़रिया का रद्द किया है, जो कहते हैं कि “हज कर आओ, मदीना शरीफ़ जाने की ज़रूरत नहीं या फिर रोज़ा-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर जाने की नीयत ना करो। फ़क़त “मस्जिदे नबवी में हाज़िरी की नीयत करो”।

आला हज़रत एक तरफ़ “ख़ाना-ए-काबा से बरकतें मिलने की सआदत का ज़िक्र कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ रोज़-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम और “शहरे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से मिलने वाली नेअमतों और रहमतों का तज़्किरा फ़रमा रहे हैं कि “अहमीयत दोनों जगह की है, नेअमतें दोनों जगह से मिल रही हैं, अल्लाह की रहमतें दोनों जगह बारिश की तरह बरस रही हैं, बल्कि “मक्का मुकर्रमा” और “ख़ाना काबा” की बरकतें और वहां की तमाम नेअमतें और रब की वहां तमाम रहमतें, उस मदीने वाले आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का सदक़ा हैं, तो हाजी उनको कैसे भूल जाए? जिनके सदक़े वह हाजी बना, हाजी रोज़-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर क्यों ना जाए ? जिनके सदक़े वह मोमिन बना। ग़र्ज़ कि कायनात की हर नेअमत, ख़्वाह कहीं से भी मिल रही हो? वह उस मदीने वाले महबूब की अ़ता और बख़्शिश है।

बिरादराने इस्लाम! मेरा इस नात शरीफ़ की शरह करने का मक़सद एक तो यह है कि मेरे वह भाई, जो आला ह़ज़रत की “नात शरीफ़” के उर्दू के मुश्किल अल्फ़ाज़ होने की बिना पर समझ नहीं पाते, वह समझ लें और दूसरा आपके इश्क़े रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक छोटी सी झलक दिखला सकूं कि आप कितने बड़े आशिक़े रसूल थे?

नात शरीफ़ का पहला शेर यह है।

हाजिओ आओ शहंशाह का रोज़ा देखो!
काबा तो देख चुके, काबे का काबा देखो!!

इस शेर का मुश्किल लफ़्ज़ का माना यह है। शहंशाह (बादशाहों का बादशाह यानी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)
इस शेर की तशरीह: ऐ हाजिओ! ख़ूश नसीब हो कि तुम्हें “हज” की सआदत नसीब हुई। तुमने “बैतुल्लाह” के अनवार-व-तजल्लियात को अपने दामन में समेटा। अब मेरी बात सुनो। चलो चलो, “मदीना शरीफ़” की जानिब चलो। उस शहंशाहे हर दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बारगाह में, जिसने “काबा मुअज़्ज़मा” को बुतख़ाना से “बैतुल्लाह और क़िब्ला” बनाया। अगर यह काबा है और यक़ीनन काबा है, तो मदीने का ताजदार तो काबे का भी काबा (क़िब्ला) है।

काबे का काबा? यहां काबे का काबा कहकर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान-व-अज़मत का इज़हार किया जा रहा है। हमारे जिस्म का क़िब्ला “ख़ाना काबा” है और रूह का क़िब्ला हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की “ज़ाते पाक” है। मतलब क्या हुआ कि अगर दिल इश्क़े मुस्तफ़ा से ख़ाली हो, तो काबा की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ना फ़ायदा ना देगा। कोई इबादत क़बूल नहीं, बल्कि ईमान की दौलत से ही महरूम कहलाएगा।

तिर्मिज़ी शरीफ़ में है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने “तवाफ़े काबा” करते हूए काबा को मुख़ातब करके फ़रमाया… “ऐ काबा! तू भी पाकीज़ा, तेरी हवा भी पाकीज़ा। उस ज़ात की क़सम, जिसके क़ब्ज़े में मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की जान है, अल्लाह तआला के नज़दीक मोमिन की इज़्ज़त तुझ से कहीं ज़्यादा है।

बिरादराने इस्लाम! जब मोमिन की इज़्ज़त “काबा शरीफ़” से ज़्यादा है, तो जिनके सदक़े मोमिन को इज़्ज़त मिली, जिनके सदक़े और रज़ा से “काबा” क़िब्ला बना, तो प्यारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शान व अज़्मत और इज़्ज़त का कौन अंदाज़ा लगा सकता है?

ह़ज़रते अल्लामा सफ़ूरी अलैहिर्रहमा किताब “शरफ़ुल्मुस्तफ़ा” से नक़ल फ़रमाते हैं कि… “क़ियामत के रोज़ “काबा शरीफ़” अपने रब से अर्ज़ करेगा कि “इलाही! मुझे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की “क़ब्रे अनवर” की ज़ियारत की इजाज़त दे, तो अल्लाह उसे इजाज़त देगा और वह हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ियारत के लिए हाज़िर होगा।

काबा का क़िब्ला बनना हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रज़ा थी, जो अल्लाह ने क़बूल फ़रमाई। अगर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की नज़र “काबा” पर ना पड़ती, तो कोई नज़र भी उधर ना उठती। हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तमाम मख़्लूक़े इलाही में अफ़्ज़ल व आला हैं। काबा भी मख़्लूक़ है। अर्श व कुर्सी भी मख़्लूक़ है।

नात शरीफ़ का दूसरा शेर यह है।

रुक्ने शामी से मिटी वहशते शामे ग़ुर्बत!
अब मदीना को चलो, सुब्हे दीले आरा देखो!!

मुश्किल अलफ़ाज़ के माना: रुक्ने शामी (ख़ाना-ए-काबा का शुमाली कोना), वहशत (डर, हैबत), शामे ग़ुर्बत (सफ़र की रात), सुब्हे दीले आरा (ऐसी सुबह, जो दिल को ज़ीनत-व-आराम देने वाली है)
तशरीह: ऐ ख़ुशक़िस्मत हाजिओ! तुम्हारे सफ़र की वहशतें, तकलीफें, कुल्फ़तें तो दौराने तवाफ़ “रुक्ने शामी” की ज़ियारत से ही दूर हो चुकी। अगर दिल की सफ़ाई, पाकीज़गी और चमक चाहते हो, अगर दिल को अल्लाह के इसरार व तजल्लियात की जलवागाह बनाना चाहते हो, तो चलो “मदीना शरीफ़” की सुहानी सुबह का नज़ारा कर लो, जो दिलों को हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नूर की बरकत से ईमान का हुस्न और तक़्वा का ज़ेवर अता करती है। वक़्ती वहशत तो “रुकने शामी” की ज़ियारत से दूर हो गई है, मगर दारेन की वहशत को दूर करने के लिए और दाइमी सुकूने क़ल्ब के लिए “मदीना शरीफ़” की हाज़िरी अक्सीरे आज़म है।

नात शरीफ़ का तीसरा शेर यह है।

आबे ज़म ज़म तो पिया, ख़ूब बुझाईं प्यासें!
आओ! जूदे शहे कौसर का भी दरिया देखो!!

मुश्किल अलफ़ाज़ के माना: जूद (करम, बख़्शिश, अता), शहे कौसर (हौज़े कौसर का मालिक, बादशाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)
तशरीह: ऐ ज़ाइरीने हरम! तुमने मक्का मुकर्रमा में “आबे ज़म ज़म” पीकर ख़ूब प्यास बुझाई और अपने दिल और जान को ठंडा किया, रूह को सुथरा किया, बहुत अच्छा किया, लेकिन अब यहां ही ना बैठे रहो। चलो मदीना चलो और वहां जाकर देखो। मालिके कौसर मुस्तफ़ा करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के करम का समुन्द्र कैसे ठाठें मार रहा है? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बारगाह से भीख भी मिलेगी और साथ में दुआ भी मिलेगी। कायनात की हर नेअमत हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के करम से मिलेगी। वहां मग़फ़िरत का सामान भी होगा और महबूब की शफ़ाअत भी नसीब होगी और तुम्हारी झोलियां भी भर जाएंगी, क्योंकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़तरा क़तरा नहीं देते, बल्कि नेअ़मतों की बरसात करते हैं, अ़ता के दरिया बहाते हैं। ख़ुदा की क़सम! इतना अ़ता करते हैं कि कुछ कमी नहीं रहती। सच्च कहा है इमाम अहले सुन्नत, फ़ाज़िले बरेलवी ने…

मेरे करीम से गर क़तरा किसी ने मांगा!
दरिया बहा दिए हैं, दुर बेबहा दिए हैं!!

नात शरीफ़ का चौथा शेर यह है।

ज़ेरे मीज़ाब मिले ख़ूब करम के छींटे!
अब्रे रहमत का यहां रोज़ बरसना देखो!!

मुश्किल अलफ़ाज़ के माना: ज़ेरे मीज़ाब (मीज़ाब के नीचे), मीज़ाब (ख़ाना-ए-काबा का परनाला जिसे मीज़ाबे रहमत भी कहते हैं, वह परनाला जिससे छनकर पानी आए), रोज़ बरसना (रोज़ाना बारिश होना)
तशरीह: मीज़ाबे रहमत जो “ख़ाना-ए-काबा” का रहमत वाला परनाला है, जब बारिश होती है, तो हुजाजे किराम उसके नीचे आ जाते हैं, ताकि करम के छींटे और करम के क़तरे उन पर पड़ जाऐं और उनको यह सआदत नसीब हो जाए, मगर यह तब ही मुम्किन है, जब वहां बारिश हो और बारिश तो कभी कभार होती है, तो ऐ हुज्जाजे किराम! तुमने “ज़ेरे मीज़ाब करम के छींटे ले तो लीए और वह भी क़तरा क़तरा तुम्हारे नसीब में आए। अब मदीना को चलो, वहां चल कर देखो। वहां तो Any Time, Day हो या Night, Morning हो या Evening , ग़र्ज़कि हर पल रहमते ख़ुदावंदी की बारिश छमाछम बरस रही है और क्यों ना हो? वहां ख़ुदा के महबूब का दरबारे गोहरबार मौजूद है। वह महबूब, जिसको सारे जहानों के लिए रहमत बनाया, “वरफ़ाना लक ज़िकरक” का ताज उसके सर पर सजाया। मालिक व मुख़्तार बनाया, मोमेनीन के दिलों का सुरूर बनाया, जिसको यह हुक्म फ़रमाया कि मंगता तुम्हारी बारगाह में आए, तो झिड़कना मत, जिसकी दुआ को मोमेनीन के दिल का चैन क़रार दिया। वहां पर रब की इनायतों, रहमतों और करम का आलम क्या होगा ?

नात शरीफ़ का पांचवां शेर यह है।

ख़ूब आंखो से लगाया है ग़िलाफ़े काअबा!
क़सरे महबूब के पर्दे का भी जलवा देखो!!

मुश्किल अलफ़ाज़ के माना: क़सरे महबूब (अल्लाह के महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का महले मुबारक), जल्वा (नूरानियत)
तशरीह: ऐ हाजिओ! तुमने “गिलाफ़े काबा” को आँखों से लगाकर “ख़ौफ़-ए-ख़ुदा” में ख़ूब रो रो कर अल्लाह से अपने गुनाहों की मुआ़फ़ी मांगी और अपने गुनाहों से तौबा की। अब “मदीना शरीफ़” जाकर देखो कि महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के “आली शान महल” का “पर्दा” कितना ख़ूबसूरत, किस क़द्र बरकतों से भरपूर और अल्लाह की रहमतों में शराबोर है। उसकी नूरानीयत के जलवे लो और उसके साये में इश्क़े रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की चमक के मज़े लो और ख़ूब “वस्ले महबूब” की नेअमत की बरकतें समेटो।

नात शरीफ़ का छटा शेर यह है।

ज़ीनते काबा में था लाख ओरूसूओं का बनाव!
जल्वा फ़रमा यहां कौनैन का दूल्हा देखो!!

मुश्किल अलफ़ाज़ के माना: ओरूसों (ओरूस की जमा यानी दुल्हन), बनाव (आराइश-व-ज़ेबाइश), कौनैन (दुनिया-व-आख़िरत)
तशरीह: बेशक “काबा मुअज़्ज़मा” की ज़ेब व ज़ीनत में लाखों दुल्हनों का बनाव सिंघार और हुस्न व जमाल है, लेकिन दुल्हन के दूल्हा ना हो, तो दुल्हन किस काम की? और अगर दो जहां का दूल्हा देखना हो, तो वह “मदीना शरीफ़” में अपने “रोज़ा” में जल्वा फ़रमा है और वह दुल्हा भी किस शान व अज़्मत वाला? कि जिसके सदक़े “काबा” लाख दुल्हनों से ज़्यादा हुस्न व जमाल वाला बना, तो जिसका सदक़ा इतना ख़ूबसूरत है, तो उसका दरबारे गोहरबार किस क़द्र ख़ूबसूरत होगा? उसके नज़ारे तुम्हें मदीना शरीफ़ में नज़र आऐंगे।

नात शरीफ़ का सातवां शेर यह है।

धो चुका ज़ुल्मते दिल बोसा-ए-संगे अस्वद!
ख़ाक बोसी-ए-मदीना का भी रुतबा देखो!!

मुश्किल अलफ़ाज़ के माना: ज़ुल्मत (गुनाहों की स्याही, अंधेरा), संगे अस्वद (स्याह पत्थर जो दीवारे काबा में नसब है), ख़ाक बोसी (मिट्टी को चूमना), रुतबा (शान व अज़्मत)
तशरीह: ऐ हाजिओ! माना कि तुमने “संगे अस्वद” को चूमा, तो उससे तुम्हारे दिल से गुनाहों की स्याही मिट गए। अब मदीना शरीफ़ चलो और वहां की ख़ाक को चूम कर देखो, तुम्हें क्या क्या बरकतें नसीब होंगी? तुम्हारा मुक़द्दर चमक जाएगा। मदीना शरीफ़ की ख़ाके मुबारक की शान व अज़्मत किस क़द्र है और क्या क्या नेअमतें तुम्हें नसीब होंगी? चूमने से तुम्हें अंदाज़ा हो जाएगा।

आख़िर में नात शरीफ़ का मक्ता पेश कर रहा हूँ। इश्क़ व मुहब्बत में डूबकर ग़ौर से पढ़ें।

ग़ौर से सुन तो रज़ा, काअबा से आती है सदा!
मेरी आँखों से मेरे प्यारे का रोज़ा देखो!!

मुश्किल लफ़्ज़ का माना: सदा (आवाज़)
तशरीह: ऐ अहमद रज़ा! उन हाजिओ को बता कि अगर तुम्हें अहमद रज़ा की बात समझ नहीं आ रही है, तो काबा की सदा सुन लो। काबा शरीफ़ के परनाले का रुख़ “मदीना शरीफ़” की तरफ़ है। गोयाकि वह ज़बाने हाल से पुकार पुकार कर कह रहा है, “मदीना शरीफ़” जा, मेरी आँखों का इशारा समझो। जा “मदीना शरीफ़” में “रोज़ा-ए-रसूल” की ज़ियारत करो, क्योंकि मेरी शान व अज़्मत भी उसी महबूब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का सदक़ा है।

(हदाइक़े बख़्शिश, कलाम: इमामे अहले सुन्नत, इमामे इश्क़-व-मुहब्बत, आला ह़ज़रत, अश्शाह इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी, रहमतुल्लाह अलैहि)

मौलाना मोहम्मद सैफुल्लाह ख़ां अस्दक़ी
राष्ट्रीय अध्यक्ष: ग़ौसे आज़म फाउंडेशन

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